बाजी प्रभु देशपांडे जीवनी – Biography of Baji Prabhu Deshpande in Hindi

आज हम आपको बाजी प्रभु देशपांडे जीवनी के बारे में बताने जा रहे है, आपको बता दे मराठों में इस शासक का नाम अभी भी वीरता के लिए गिना जाता है। यह एक वीर शासक था जिसने अपने स्थान में वीरता के बल पर बहुत कुछ हासिल किया। अर्थात इनको मराठा वीर योद्धा कहा जाना ... Read more

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Reported by Saloni Uniyal

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आज हम आपको बाजी प्रभु देशपांडे जीवनी के बारे में बताने जा रहे है, आपको बता दे मराठों में इस शासक का नाम अभी भी वीरता के लिए गिना जाता है। यह एक वीर शासक था जिसने अपने स्थान में वीरता के बल पर बहुत कुछ हासिल किया। अर्थात इनको मराठा वीर योद्धा कहा जाना चाहिए। शिवाजी महाराज ने जब इनकी वीरता के बारे में सुना और देखा तो उन्होंने इन्हें अपनी सेना में एक महत्वपूर्ण जगह दी। इन्होंने मुग़ल सेना के सैनिकों से भयंकर युद्ध किया और अकेले ही उनको मार डाला। यह जानकार तो आपको पता चल ही गया होगा कि बाजी एक निडर, साहसी तथा देशभक्ति के लिए कुछ भी कर जाने वाले व्यक्ति थे। इस लेख में हम आपको बाजी प्रभु देशपांडे जीवनी (Biography of Baji Prabhu Deshpande in Hindi Jivani) से जुड़ी जानकारी प्रदान करने वाले है, इसलिए आप इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़ें।

बाजी प्रभु देशपांडे जीवनी - Biography of Baji Prabhu Deshpande in Hindi Jivani
बाजी प्रभु देशपांडे जीवनी

बाजी प्रभु देशपांडे जीवनी

Baji Prabhu Deshpande का जन्म वर्ष 1615 में महाराष्ट्र राज्य के पुणे क्षेत्र में स्थ्ति भोर तालुका में हुआ था। इनका मराठी परिवार था तथा चन्द्रसेनीय कायस्थ प्रभु इनका वंश था। बचपन से ही इनके मन में देशभक्ति करने का बहुत जुनून था। इन्होंने भारत पर हमला करने वाले मुगलों को देश से खदेड़ कर बाहर फेक दिया था और इसी वीरता से प्रभावित होकर शिवाजी ने इन्हें अपनी वीरता को और निखारने का मौका दिया। शिवाजी ने अपनी दक्षिणी सेना को इनके हवाले कर दिया था। अर्थात उन्हें बाजी पर इतना विश्वास था।

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Biography of Baji Prabhu Deshpande in Hindi Jivani

नामबाजी प्रभु देशपांडे
जन्म1615 ई.
जन्म स्थानभोर तालुक, पुणे
धर्महिन्दू
मृत्यु1660 ई.
मृत्यु स्थानकोल्हापुर (महाराष्ट्र)
वंशचन्द्रसेनीय कायस्थ प्रभु वंश
प्रसिद्धिमराठा सरदार

शिवाजी महाराज की सेना में शामिल

भारत देश में मुगलों ने हमला करके कई स्थानों पर कब्ज़ा कर लिया था और देशभक्ति से परिपूर्ण देशपांडे मुगलों के राज को मुक्त करना चाहते थे। देश की सेवा करने के लिए शिवाजी ने उनको एक मौका दिया और अपनी सेना में शामिल कर लिया।

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बाजी की वीरता की खबर तो शिवाजी को पता ही थी परन्तु जब उन्होंने अपने सामने उनकी वीरता को देखा तो वे उनसे अत्यधिक प्रभावित हुए और उन्होंने अपनी कोल्हापुर में स्थित दक्षिण महाराष्ट्र सेना को बाजी के हाथों में सौंप दिया। यह कार्य अपने हवाले होने पर देश पांडे ने मुख्य भूमिका अदा की। महाराष्ट्र साम्राज्य को बचाने तथा शिवाजी को मारने की धमकी पर अफजल खान को आदिल शाही राजा ने भेजा था।

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पावनखिंड का युद्ध

अब प्रताप गढ़ में अफजल खान से युद्ध करने के लिए चले गए उन्होंने उसे युद्ध में हरा दिया था बीजा पुरी सेना को भी हरा डाला, तथा नेता जी पालकर मराठा सेना को लेकर बीजापुर की और निकल पड़े। परन्तु उन्हें बीजापुर से हटा दिया गया, Shivaji और उनकी सेना के सेनापति तथा सैनिकों को पन्हाला के किले से हटाना शुरू कर दिया। जब जनरल सिद्धि जौहर को यह पता चला कि शिवाजी पन्हाला के किले के पास है तो उन्होंने पन्हाला में घेराबंदी कर दी। जनरल सिद्धि जौहर बीजापुरी सेना का नेतृत्व कर रहा था। इस घेराबंदी को तोड़ने के लिए नेता जी पालकर ने बहुत प्रयास किया परन्तु वे इसमें विफल होकर हट गए।

यह घेरा बंदी केवल एक दो दिन के लिए नहीं थी बल्कि यह महीनों तक रही और शिवाजी तथा मराठा सैनिक इसे हटाने की कोशिश पर जुटे हुए थे परन्तु उन्हें कुछ भी हासिल नहीं हुआ।

शिवजी महाराज का बचाव

जब चारों और से घेरा बंदी हो गयी थी और इसे तोड़ना मुश्किल हो गया और वे नाकामयाब रहे। शिवाजी और नेताजी पालकर दोनों साथ में बाहर गए और उन्होंने वहां घेरना चाहा तो वे विफल हो गए। इसके पश्चात शिवाजी ने कहा कि अब यह अंतिम युद्ध होगा और उन्होंने एक नई योजना को अपनाया और अब विशाल गढ़ किले में युद्ध करने की रणनीति बनाई।

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योजना बनाने के पश्चात शिवाजी और बाजी ने दो सैनिक बनाए। वहां पर एक शिवनाइ था जो वहां पर मौजूद था और वह बिल्कुल शिवजी की तरह दिखाई देती था। और दूसरी सेना को शिवाजी ने प्रस्तुत किया और इस सेना में महाराज तथा बहादुर बाजी एवं अन्य मराठा भी शामिल हुए थे। अब शिवा नाभिक अपनी सेना लेकर निकला और सिदी जौहर की चौकीदार सेना के लिए छल कपट की एक योजना बनाई। जो दुश्मन था उसने सोचा कि यह असली शिवाजी है और वह प्रसन्न हो उठा, जब उसने देखा कि यह तो नकली शिवाजी है और उनके साथ धोखा हुआ है तो उसने गुस्से में आकर उसका सर तलवार से काट डाला।

उसके पश्चात मराठा सैनिक जल्दी से घोडखिंड चले गए। और यह इनका युद्ध करने का अंतिम ही समय बना। और आधी सेना विशालगढ़ की ओर प्रस्थान कर गई और प्रभु तथा 300 सैनिक एवं अन्य मराठे दर्रे की और जाने लगे परन्तु बादल की सेना ने रोक लिया। और फैसला किया गया कि घोड़खंड में 10 हजार बीजापुरी सैनिकों से युद्ध किया जाएगा। और संकेत पहुँचाने के लिए तीन तोपों को दागा गया कि शिवाजी और उनकी सम्पूर्ण सेना सुरक्षित स्थानों पर चली जाए। और अब थी युद्ध की बारी, महादेव के मन्त्र का जाप करते हुए मराठों ने मुगलों को हरा दिया और उन्होंने दुश्मन को घेरने के लिए अपनी तलवारों का इस्तेमाल करके एक दीवार बनाई।

बाजी की क्षमता

लगभग 300 मराठों ने 10 हजार सैनिकों को हरा दिया और इस युद्ध में बाजी भयंकर तरीके से घायल हो गए, उनकी जो तलवारें थी वो टूटने लग गई परन्तु उन्होंने युद्ध करना नहीं छोड़ा उनसे जितना भी प्रयास हो रहा था वे उतना सब कर रहे थे। इसके पश्चात शिवाजी 300 मराठों को लेकर सैनिक विशालगढ़ पहुंचे। परन्तु पहले ही वहां मुग़ल सरदार अपनी सेना को लेकर कब्जा कर चुके थे। और फिर शिवाजी और उनकी सेना ने शौर्य के साथ युद्ध लड़ा और उसे परास्त कर दिया।

मृत्यु (वीरगति)

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जब शिवाजी महाराज की सेना युद्ध कर रही थी तो उस समय विशालगढ़ में एक और मुग़ल सरदार सेना वहां पहले से ही स्थित थी। इनसे भी महाराज की सेना का युद्ध होने लगा और लड़ाई इतनी भयंकर थी की सुबह कब हुई पता ही नहीं चला। शिवाजी ने सूर्योदय होते तक तीन तोपे दाग दी ताकि बाजी को इशारा दिया जा सके। हालाँकि बाजी जिन्दा थे परन्तु वे बहुत घायल हो गए थे और मृत्यु कब हो जाए इसका कुछ पता ना था इसलिए उनके सेना के सैनिक उन्हें उठा कर एक दर्रे पर ले गए। दर्रे पर पहुँचते ही बाजी आखिरी बार मुस्कराए और इस दुनिया को अलविदा कह गए। और एक वीर योद्धा जो अपने देश के लिए कुछ भी करने को तैयार था उसने अपनी जान देकर यह शामिल कर दिया और उसका नाम इस दुनिया से मिट गया। जैसे ही यह खबर शिवाजी को पहुंची तो उनको बहुत दुख हुआ कि हमने एक वीर को खो दिया। बाजी के दर्रे मर रक्त गिरने से उन्होंने घोड़ कींद दर्रे का नाम पावन कींद रखते हुए एक भाव भीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

बाजी प्रभु देशपांडे जीवनी से सम्बंधित प्रश्न/उत्तर

Baji Prabhu Deshpande का जन्म कब हुआ था?

इनका जन्म 1615 ई. में हुआ था।

Baji Prabhu Deshpande का वंश क्या था?

इनके वंश का नाम चन्द्रसेनीय कायस्थ प्रभु वंश था।

Baji Prabhu Deshpande की मृत्यु कब हुई थी?

वर्ष 1660 में महाराष्ट्र के कोल्हापुर में इनकी मृत्यु हुई थी।

बाजी प्रभु का जन्म कहाँ हुआ था?

महाराष्ट्र के पुणे में स्थ्ति भोर तालुक में इनका जन्म हुआ था।

बाजी प्रभु का क्या धर्म था?

यह हिन्दू धर्म के थे।

बाजी प्रभु देशपांडे कौन था?

यह एक मराठी वीर योद्धा थे। मराठों के वीर शासकों में इनका नाम गिना जाता है। इनकी वीरता से प्रसन्न होकर शिवजी ने इन्हे अपनी सेना में अहम् स्थान प्रदान किया था।

शिवाजी महाराज ने बाजी की वीरता से प्रभावित होकर क्या किया?

शिवाजी महाराज ने बाजी की वीरता से प्रभावित होकर अपनी सेना में उन्हें महत्वूर्ण स्थान प्रदान किया ताकि ऐसे महान योद्धा के होने से हमारी सेना को कोई नहीं हरा सकता।

जैसा कि हमने आपको यहां Biography of Baji Prabhu Deshpande in Hindi Jivani से सम्बंधित सम्पूर्ण जानकारी को प्रदान किया है। यदि आप इस लेख से सम्बंधित अन्य जानकारी या कोई प्रश्न पूछना चाहते है तो आप नीचे दिए हुए कमेंन्ट सेक्शन में अपना प्रश्न लिख सकते है जल्द ही हमारी टीम द्वारा आपके प्रश्नो का उत्तर दिया जाएगा। इसी तरह की जानकारी प्रदान करने के लिए हमारी साइट से ऐसे ही जुड़े रहे। आशा करते है कि आपको हमारा यह लेख पसंद आया हो।

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