Kamakhya Temple : कामाख्या मंदिर के कुछ गुप्त रहस्य, कामाख्या मंदिर कब जाना चाहिए?

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Reported by Rohit Kumar

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हमारे देश में ऐसे बहुत से स्थान हैं जिन्हें आज भी जागृत शक्तिपीठ के रूप में पूजा जाता है। भारत भूमि भक्ति और साधना के लिए जानी जाती है। आज जबकि सम्पूर्ण विश्व के साथ-साथ हमारा देश भी विकासशील है, आस्था और भक्ति अभी भी अपने पूरे वर्चस्व के साथ मानव कल्याण हेतु अभी भी बनी हुई है। आज इस लेख के माध्यम से हम आप को Kamakhya Temple व इससे जुड़े कुछ गुप्त रहस्य से संबंधित जानकारी प्रदान करेंगे। विस्तृत जानकारी हेतु आप इस लेख को पूरा पढ़ें।

जानिए कामाख्या देवी मंदिर के बारे में

कामाख्या देवी मंदिर माता सती से संबंधित मंदिर है। इसे देवी दुर्गा का जागृत धाम या सिद्धपीठ के रूप में भी जाना जाता है। यहाँ माता की कामाख्या के रूप में पूजा की जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यहाँ पर माता सती की देह का एक अंग (योनि भाग) गिरा था। जिस के बाद से ये एक विग्रह में परिवर्तित हो गया और बाद में सिद्धपीठ बन गया और तब से इसे पूजा जाने लगा। कामाख्या देवी मंदिर असम की राजधानी दिसपुर से लगभग 7 किलोमीटर दूर स्थित है और यह शक्तिपीठ नीलांचल पर्वत से 10 किलोमीटर दूर है। 

जानकारी हेतु बताते चलें कि माता सती के 51 शक्तिपीठ में से कामाख्या में आया हुआ शक्तिपीठ को सबसे ज्यादा महत्व का बताया गया है। मंदिर के भीतर माँ भगवती की महामुद्रा का निर्माण किया गया है। इसके साथ ही ये मंदिर तंत्र मन्त्र से जुडी सिद्धियों के लिए भी जाना जाता है। साथ विभिन्न चमत्कारों के किस्सों के लिए भी ये मंदिर प्रसिद्द है। यहाँ आप को माता की कोई मूर्ति या चित्र नहीं मिलेगा। बल्कि आप मंदिर में एक कुंड देखेंगे जो कि हमेशा फूलों से ढका हुआ होता है। इस कुंड से जल की अनवरत धारा बहती है। इस मंदिर में देवी की योनि की पूजा होती है। और इसलिए यहाँ माता रजस्वला भी होती हैं।

कामाख्या मंदिर (Kamakhya Temple)  के कुछ गुप्त रहस्य
कामाख्या मंदिर के कुछ गुप्त रहस्य, Kamakhya Temple

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Kamakhya Temple /कामाख्या देवी मंदिर से जुडी कथा

कामाख्या देवी मंदिर से जुडी कथा के अनुसार माता सती के पिता दक्ष ने हवन का आयोजन किया जिसमें उन्होंने सभी देवों को बुलाया परन्तु अपनी बेटी सती व जमाता शिव को इसका निमंत्रण नहीं दिया। इसे देवी सती ने अपने पति का अपमान समझा और हवन स्थल पर जाकर अपने योगबल के साथ हवनकुंड में अपनी आहुति दे दी। माता सती की देह उठाकर भगवान शिव काफी समय तक तांडव करते रहे। तब भगवान विष्णु ने उनके मोह को भंग करने के उद्देश्य से देवी सती की देह को अपने सुदर्शन चक्र से 51 भागों में विभाजित कर दिया। देवी सती के अंग जहाँ-जहाँ पड़े वहां उनके सिद्धपीठ बन गए। जिनमे से सबसे अधिक माहात्म्य कामाख्या देवी मंदिर का माना जाता है।

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क्यों बाकी सिद्धपीठ से विशेष है ये मंदिर ?

देवी के 51 सिद्धपीठों में से इसे महापीठ माना जाता है। ये शक्तिपीठ बहुत चमत्कारी और प्रसिद्ध है। यहाँ दूर दूर से लाखों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन हेतु पहुँचते हैं। आगे आप पढ़ेंगे इस सिद्धपीठ की विशेषताओं के बारे में –

यहाँ नहीं है कोई मूर्ति

इस सिद्धपीठ मंदिर में कोई मूर्ति या चित्र की पूजा नहीं होती है। यहाँ एक कुंड है जहाँ अनवरत जलधारा बहती रहती है। यह कुंड हमेशा फूलो से ढका रहता है। यहां देवी की योनि की पूजा होती है।

तंत्र मन्त्र साधना के लिए प्रसिद्द

आये दिन यहाँ चमत्कार होते रहते हैं। जिसके लिए ये मंदिर बहुत प्रसिद्ध है। कामाख्या देवी सिद्धपीठ को अघोरियों और तांत्रिकों का गढ़ भी माना जाता है। कहते हैं यहाँ तांत्रिक और अघोरी तंत्र विद्या और अन्य सिद्धियां प्राप्त करने के लिए साधना करते हैं। जब तक माँ का आशीर्वाद न मिले उनकी साधना पूरी नहीं होती और साथ ही अपने साधना के बल पर वे चमत्कार कर लोगों को बुरी शक्तियों से भी रक्षा करते हैं। हालाँकि वो अपनी शक्तियों का प्रयोग बहुत सोच विचार के करते हैं बता दें कि तांत्रिकों और अघोरियों के लिए काली और त्रिपुर सुंदरी देवी के बाद कामाख्या माता सबसे महत्वपूर्ण देवी है। 

रबी और खरीफ फसलों के बीच अंतर - Difference Between Rabi and Kharif Crops

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कामाख्या मंदिर का प्रसाद

यहाँ मिलने वाला प्रसाद भी अनोखा होता है। दरअसल यहाँ लोगों को फल पुष्प आदि की बजाए अम्बुवाची कपड़ा दिया जाता है। अम्बुवाची उस कपड़े को कहते हैं जो माँ के तीन दिन रजस्वला होने पर भक्तों को मंदिर के कपाट खुलने पर प्रदान किया जाता है। ये बहुत ही पवित्र माना जाता है। इसे लोग अपने घरों में ले जाकर पूजा स्थल पर रखते हैं। माना जाता है कि माँ के मासिक धर्म के होने पर सफ़ेद कपड़ा मंदिर / दरबार में रख दिया जाता है। जिसे तीन बाद कपाट खुलने पर ये कपड़ा माँ के रज से लाल हो जाता है, जिसे भक्तों में बाँट दिया जाता है।

आज भी दी जाती है बलि

वर्तमान में विभिन्न मंदिरों में पशुबलि प्रथा को बंद कर दिया गया है लेकिन ये मंदिर ऐसा है जहाँ आज भी माँ कामाख्या को पशुओं की व अन्य बलि चढ़ाई जाती है।

ब्रह्मपुत्र का पानी तीन दिनों के लिए लाल हो जाता है

प्रत्येक साल जब अम्बुवाची मेला का आयोजन होता है, उस दौरान पास ही स्थित ब्रह्मपुत्र नदी का पानी तीन दिनों के लिए लाल हो जाता है। मान्यता है कि माँ कामाख्या के रज से पानी का रंग लाल हो जाता है।

मनोकामनाएं होती हैं पूर्ण

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मान्यता हैं की यहाँ सभी की सदिच्छा और मनोकामनाएं पूर्ण होते हैं। इसके लिए भक्त मंदिर में कन्या पूजन व भंडारा करवाते हैं।

महिलाएं अपने माहवारी में भी कर सकती हैं मंदिर में प्रवेश

असम में स्थित ये सिद्धपीठ इकलौता ऐसा मंदिर हैं जहाँ रजस्वला महिलाएं भी मंदिर में प्रवेश कर सकती हैं। जबकि पूरे देश में किसी भी महिला को अपनी माहवारी के दिनों में मंदिरों में प्रवेश वर्जित किया जाता है।

कामाख्या मंदिर कब जाना चाहिए?

यूँ तो सभी भक्तजन साल में कभी भी दर्शन हेतु कामाख्या देवी सिद्धपीठ में जा सकते हैं। लेकिन विशेष रूप से भक्तजन, लाखों की संख्या में दुर्गा पूजा, दुर्गादेऊळ, पोहान बिया, वासंती पूजा, मदानदेऊल, अम्बुवासी और मनासा पूजा पर कामाख्या मंदिर पहुंचकर देवी का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यदि आप भी देवी कामाख्या के दर्शन हेतु जाना चाहते हैं और ये सोच रहे हैं कि कामाख्या मंदिर कब जाना चाहिए ? तो आप को बता दें की यहाँ बताये गए अवसरों पर जाकर आप भी माता का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि इसके इतर भी आप कभी भी मंदिर में जा सकते हैं, आप की श्रद्धा और भक्ति महत्वपूर्ण है, जिससे आप को माँ की कृपा प्राप्त होगी।

Kamakhya Temple से संबंधित प्रश्न उत्तर

कामाख्या मंदिर (Kamakhya Temple) कब बंद रहता है ?

हर साल आषाढ़ महीने में यानी लगभग 22 जून से 26 जून तक अंबुबाची उत्सव या मेला मनाया जाता है। मान्यता है कि इन दिनों में देवी मां रजस्वला होती हैं, जिस वजह से अंबुबाची उत्सव के दौरान कामाख्या मंदिर का कपाट बंद कर दिया जाता है।

कामाख्या देवी का रहस्य क्या है ?

पौराणिक कथाओ के अनुसार जब माता सती ने हवनकुंड में अपना देह त्याग किया तो शिवजी उनके देह को लेकर घूमने लगे जिस वजह से उनका मोह भांग करने हेतु विष्णु जी ने माता सती की देह को अपने सुदर्शन चक्र से काट दिया। मन जाता है कि नीलांचल पर्वत पर माता की योनि गिरी थी, जिसके कारण यहां कामाख्या देवी शक्तिपीठ की स्थापना हुई. ऐसी मान्यता है कि माता की योनि नीचे गिरकर एक विग्रह में परिवर्तित हो गयी थी, जो आज भी मंदिर में विराजमान है और जिससे आज भी माता की वह प्रतिमा रजस्वला होती है।

कामाख्या देवी की पूजा करने से क्या होता है?

कामाख्या देवी के पूजन से धन संबंधी परेशानिया दूर होती हैं। साथ ही लम्बे समय से चली आ रही अन्य कई समस्याएं जैसे कानूनी विवाद, व्यापार में हो रहा नुकसान, विवाह में आ रही मुश्किलें आदि अन्य समस्याएं दूर हो जाती है। इसके साथ ही सभी अच्छे कार्यों में सफलता मिलती है।

कामाख्या नाम का मतलब क्या होता है?

कामाख्या का मतलब देवी दुर्गा, इच्छाओं की दाता, दुर्गा का एक रूप होता है।

कामाख्या का जन्म कैसे हुआ?

पौराणिक कथा के अनुसार जब देवी सती अपने योगशक्ति से अपना देह त्याग दी तो भगवान शिव उनको लेकर घूमने लगे उसके बाद भगवान विष्णु अपने चक्र से उनका देह काटते गए तो नीलाचल पहाड़ी में भगवती सती की योनि (गर्भ) गिर गई, और उस योनि (गर्भ) ने एक देवी का रूप धारण किया, जिसे देवी कामाख्या कहा जाता है।

कामाख्या मंदिर (Kamakhya Temple) किस लिए प्रसिद्ध है?

कामख्या देवी मंदिर को सबसे पवित्र शक्तिपीठों में गिना जाता है (भक्ति मंदिर जहां देवी सती के शरीर के अंग गिरे थे), कामाख्या देवी मंदिर वह स्थान या शक्तिपीठ है जहाँ माना जाता है कि जहां देवी का गर्भ गिरा था।

आज इस लेख में आप ने कामाख्या देवी मंदिर के बारे में जानकारी पढ़ी। उम्मीद है आप को ये जानकारी पसंद आयी होगी। ऐसे ही अन्य रोचक और रहस्यों से भरे लेखों के बारे में पढ़ना चाहते हैं तो हमारे वेबसाइट Hindi NVSHQ पर विजिट कर सकते हैं।

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